मौन की देहरी पर क्षण ठहरा
शून्य ने शिव का स्वर पहना।
नीले नभ के तारे झुके
ध्यान तले सब काल रुके।
त्रिनयन में सत्य प्रखर
करुणा से ब्रह्मांड अमर।
मन में भय की दीवार उठे
महाकाल के स्पर्श से मिटे।
काल के पार, काल के पार
ले चल हमको, हे त्रिपुरारि!
भय की रेखा मिटती जाए
सोई चेतना ज्योति पाए!
जय महाकाल—अनंत पुकार!
धिमि-धिमि पग, घन-घन नाद
अग्नि जगाए आदिम नाद!
कालचक्र से चेतन स्वतंत्र
शिव त्र्यम्बक, शाश्वत मंत्र!
रेत-घड़ी से दिन झरते हैं
नाम और वैभव सब ढहते हैं।
जो क्षण प्रेम में अर्पित हो
वह मृत्यु से भी आगे हो।
बीता छोड़ो, कल मत माँगो
इस धड़कन में शिव को जानो।
काल के पार, काल के पार
प्रेम बने जीवन का सार!
अंतिम साँस भी दीप जलाए
अंत स्वयं आरंभ बन जाए!
जय महाकाल—अनंत पुकार!
क्षण हूँ मैं, पर ज्योति अखंड
शिव ही आदि, शिव ही अनंत।
महाकालाय नमः।