
时间:2024-10-13
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वो कौन है, वो कैसी है
वो कैसी दिखती है
बस आती है ख़्वाबों में
ना जाने कैसी दिखती है।
कभी रेत सी फिसलती है
कभी बर्फ सी पिघलती है
वो कुछ कुछ ऐसी दिखती है
वो कुछ कुछ ऐसी दिखती है।
वो एक पहेली सी लगती है
हर रोज़ शाम सी ढलती है
ना आएगी किसी के हाथ
वो एक जादू सी लगती है।
वो ऐसी दिखती है
वो ऐसी दिखती है।
वो सुबह की ओस की नमी सी
सूरज की किरणों सी चमकती है।
वो नदियों सी बहती है
और गुमनाम रास्तों सी दिखती है।
वो ऐसी ही दिखती है
वो ऐसी ही दिखती है।
वो समंदर की लहरों सी
किसी जंगल के मोर-Ni सी
किसी रास्ते के मोड़ सी दिखती है।
वो ऐसी ही दिखती है
वो ऐसी ही दिखती है।
वो पतझड़ के पत्तों सी
सावन के झूलों सी
बसंत के रंग-बिरंगे फूलों सी दिखती है।
वो ऐसी ही दिखती है
वो ऐसी ही दिखती है।
वो ऐसी ही दिखती है
वो ऐसी ही दिखती है।
वो ऐसी ही दिखती है।