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॥ दोहा 53 ॥
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर,कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।
॥ चौपाई ॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
रावन दूत हमहि सुनि काना।कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे।राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई।बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी।बिकटानन बिसाल भयकारी॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला।अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥