सप्तमे दिवसे भीष्म: कुरु नियतारूपे विहिता:।
शर शते व्यापितो रक्तजगत् पूरयामास महाबली:
(अर्थ:- सातवाँ दिन बीता, भीष्म ने फिर आठवाँ दिन रक्त से रंग डाला।)
Verse १:-
भोर भयी जब सूर्य चढ़ गया सेना फिर से एकत्र भयी।
शुरू शंखनाद क्रंदन विषाद और तीव्र ध्वनि सर्वत्र भयी।
कूर्म व्यूह रच खड़े भीष्म नेत्रों में तीव्र यूँ ज्वाला ले।
पांडव तीन शिखर व्यूह रच खड़े त्रिशूल सी ढाला ले।
भीष्म वज्र संग बाण वर्षा से पांडव सेना ध्वस्त करे,
ले गदा आक्रमण करे भीम और भीष्म सारथी नष्ट करें।
दुर्योधन के आठ भाई गदाधारी भीम ने मार दिये,
दिया कौरव सेना को आघात क्रोधित होकर थे वार किये।
अभिमन्यु संग इरावान,कौरव के पक्ष को हानि दे।
तांडव मृत्यु का चलता, मरते को कौन भला पानी दे।
इरावान मृत्यु को प्राप्त, अलम्बुश के हाथों हुए रण में आज।
शोक व्याप्त, पांडव में ह्रास, मृत्यु का आज, कण कण में वास,
कृष्ण, अर्जुन, अभिमन्यु, भीम, भगदत्त, द्रोण, कृपाचार्य, भीष्म।
रण में दिखते मुख्य भूमिका में इनकी ही युद्धनीति थी तीक्ष्ण।
घटोत्कच का फैला मायाजाल दुर्योधन के संग युद्ध हुआ।
शक्ति छोड़ी कौरव पे ज्येष्ठ, पहुंची ना मार्ग अवरुद्ध हुआ।
आए आगे और शक्ति खाके, हुए भंग, बंग (बंग नरेश)मृत्यु को प्राप्त।
बचे प्राण आज दुर्योधन के वरना था युद्ध आज ही समाप्त।
देख दृश्य भगदत्त पहुंचे, माया को काटे क्षण भर ना सोचे।
भीम पुत्र और भीम दोनों को रोक, लड़ गए इकले दो से।।
Hook:-
मृत्यु का हाहाकार हर और गूंजे बस त्राहिमाम।
शत्रु भी भाई-भाई ना शीष कटने पर था विराम।
रण बोले पाहिमाम, धरा सींच रक्त ये लाल, आम (हाँ),
मृत्यु मृत्यु से कांपी, महाभारत इसका था ही नाम।।
Verse २:-
युद्ध भूमि पर अस्त्र-शस्त्र की गूंज से धरती कांप रही।
हर क्षण प्रतिक्षण छूटे है बाण वायु भी वेग सम नाप रही।
नभ में चढ़के दिव्यास्त्र आज कम्पित भूतल भूखंड करें।
एक बाण से छूट तीर लाखों आच्छादित खंड करें।
धड़क उठा रणभूमि का स्वर बाणों की बारात चली।
युद्धघोष हर स्वर गूँजे, हर पग पे पीड़ा अनायास चली।
बात चली ये रण में आज, पांडव की सेना निष्णात चली।
रथ पे पार्थ संग मायाधारी, माया पांडव के साथ चली।
क्रोध, पीड़ा, अपमान भाव, आंखों में अग्नि, दे भीम घाव।
वध करूंगा १०० कौरवों का, ली थी प्रतिज्ञा ना रुकते पांव।
घुसके भीम कौरव के मध्य 9 कौरवों का संहार करें।
अंत:वेदना बल में बदली, वो बदला लेके हुंकार भरे।
द्रोण कृपा ना चली आज, प्रतिघात भीम हाथों पाया।
श्रीधारा वज्र से रणकटाक्ष, प्रतिशोध युद्ध में गहराया।
धधक रहा कण-कण रण का, और रक्त से भीगे वक्ष दिखे।
अर्जुन के संग भीष्म करते बस बाण वर्षा हर वक्त दिखे।
दो थे पक्ष दोनों में हानि,पर कौरव शोकाकुल थे व्याप्त।
और दुर्योधन के 17 भाई हुए रण में आज मृत्यु को प्राप्त।
थमा युद्ध जब ढला सूर्य, दिन आठवां भी यूँ बीत चला।
जय पराजय स्थिर ना अब भी, कुरुक्षेत्र स्वयं ही जीत चला।।
Hook:-
मृत्यु का हाहाकार हर और गूंजे बस त्राहिमाम।
शत्रु भी भाई-भाई ना शीष कटने पर था विराम।
रण बोले पाहिमाम, धरा सींच रक्त ये लाल, आम (हाँ),
मृत्यु मृत्यु से कांपी, महाभारत इसका था ही नाम।।
Outro:-
तत: सन्ध्यां समासाद्य नि:शब्दा पृथिवीभवत्।
न हाभूल्कश्चन स्तोतु न च वादयितुं तदा।
(अर्थ:- संध्या के समय जब युद्ध थमा, तब पूरी पृथ्वी मौन हो गई, ना कोई बोल सका, न शंख बजा, वीर थक चुके थे, किंतु धर्म अब भी जीवित था)
समाप्त।।