
在手机上保存,获得更好体验
॥ दोहा 6 ॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम,सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।
॥ चौपाई ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना।कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा।तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥