
在手机上保存,获得更好体验
॥ दोहा 33 ॥
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल,तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल।
॥ चौपाई ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी।देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी।एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा।रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा।जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।कहा चलैं कर करहु बनावा॥
अब बिलंबु केह कारन कीजे।तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।नभ तें भवन चले सुर हरषी॥