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॥ दोहा 8 ॥
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन,परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।
॥ चौपाई ॥
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥