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॥ दोहा 14 ॥
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर,अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर।
॥ चौपाई ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता।मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई।काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।सुनि मम बचन तजहु कदराई॥